
नई दिल्ली। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने 25 अगस्त को एस्सेल समूह के संस्थापक सुभाष चंद्र की उस पुनर्भुगतान योजना को मंज़ूरी दे दी है, जिसके तहत लेनदारों को कुल ₹6.5 करोड़ मिलने हैं। इसी मामले में स्वीकृत दावे ₹22,006.57 करोड़ के हैं।
दो आँकड़े साथ रखकर देखिए।
स्वीकृत दावे: ₹22,006.57 करोड़।
मंज़ूर योजना: ₹6.5 करोड़ — इसमें ₹6.25 करोड़ लेनदारों के लिए और ₹25 लाख दिवाला समाधान प्रक्रिया के ख़र्च के लिए हैं।
यानी वसूली लगभग 0.03 प्रतिशत। कटौती लगभग 99.97 प्रतिशत।
मामला क्या है
बार एंड बेंच तथा बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला विवेक इंफ्राकॉन को दिए गए ₹170 करोड़ के ऋण से जुड़ा है, जिसमें सुभाष चंद्र व्यक्तिगत जमानतदार थे। ऋण के फँसने के बाद इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस — जिसे अब सम्मान कैपिटल कहा जाता है — ने 2022 में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 95 के तहत एनसीएलटी का रुख़ किया। यह याचिका 2024 में स्वीकार हुई।
इस वर्ष न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी की राय अलग-अलग रही। भारद्वाज योजना को मंज़ूरी देने के पक्ष में थे, जबकि पुरी ने इसमें गंभीर विधिक और प्रक्रियागत ख़ामियाँ बताईं। मतभेद के बाद एनसीएलटी अध्यक्ष ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत मामला तीसरे सदस्य को भेजा।
तीसरे सदस्य के रूप में न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने आईबीसी की धारा 114 के तहत योजना को मंज़ूरी दी। उन्होंने कहा कि योजना धारा 115 के तहत उन लेनदारों पर भी बाध्यकारी होगी जिन्होंने इसके विरुद्ध मत दिया या मतदान से दूर रहे।
बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार योजना को 80.81 प्रतिशत मत-हिस्सेदारी वाले लेनदारों का समर्थन मिला। आईबीसी में 75 प्रतिशत की आवश्यकता होती है। विरोध करने वाले लेनदारों की कुल हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से कम थी।
लेनदारों ने न्यायाधिकरण में क्या कहा
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने न्यायाधिकरण में कहा कि उसके ₹1,322.39 करोड़ के स्वीकृत दावे के बदले उसे लगभग ₹38.09 लाख मिलेंगे। संस्था ने यह भी कहा कि योजना में प्रस्तावित ₹6.5 करोड़ की राशि को स्वयं योजना में ही सांकेतिक और अनिश्चित बताया गया है।
आपत्ति करने वाले लेनदारों ने न्यायाधिकरण के समक्ष कुछ शुद्ध-संपत्ति प्रमाणपत्रों का हवाला दिया। रिपोर्टों के अनुसार इन प्रमाणपत्रों में 2017 में लगभग ₹45,888 करोड़ और 2018 में लगभग ₹40,562 करोड़ की शुद्ध संपत्ति दर्ज बताई गई, जबकि वर्तमान में घोषित शुद्ध संपत्ति लगभग ₹31.79 करोड़ बताई गई है। लेनदारों का तर्क था कि इस अंतर को देखते हुए योजना मंज़ूर करने से पहले फोरेंसिक ऑडिट और संपत्तियों का पता लगाया जाना चाहिए।
बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार, योजना का विरोध करने वालों में एचडीएफसी बैंक, ऐक्सिस बैंक, केनरा बैंक, आरबीएल बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस शामिल रहे।
न्यायाधिकरण ने आपत्तियों पर क्या कहा
यह पक्ष भी उतना ही ज़रूरी है।
न्यायाधिकरण ने कुछ इकाइयों के मताधिकार को लेकर उठाई गई आपत्ति स्वीकार नहीं की। लेनदारों ने कहा था कि वीना इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइज़र्स एलएलपी, लेमोनेड कैपिटल एडवाइज़र्स एलएलपी और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइज़र्स एलएलपी को सुभाष चंद्र का “सहयोगी” (associate) माना जाए और उनके मत अलग किए जाएँ।
सदस्य शर्मा ने कहा कि इन इकाइयों का आईबीसी की धारा 79(2)(g) में दी गई परिभाषा के अंतर्गत आना सिद्ध नहीं हुआ। केवल पारिवारिक, व्यावसायिक या वाणिज्यिक निकटता के आरोप के आधार पर वैधानिक परिभाषा का विस्तार नहीं किया जा सकता, इसलिए उनके मत बाहर नहीं किए जा सकते।
न्यायाधिकरण ने यह भी पाया कि दो लेनदारों — अनिल कुमार (960 व्यक्तियों की ओर से) और सुनील जैन (300 व्यक्तियों की ओर से) — के दावे बिना समर्थक दस्तावेज़ों के स्वीकार कर लिए गए थे। इसे समाधान पेशेवर की चूक माना गया, किंतु सदस्य शर्मा ने कहा कि यह चूक पूरी योजना को अमान्य करने जितनी गंभीर नहीं है। उन्होंने इन दावों को सूची से हटाने का निर्देश दिया, जिसके बाद ₹6.25 करोड़ शेष पात्र लेनदारों में बाँटे जाएँगे। अंतिम वसूली का आँकड़ा इस संशोधित सूची के बाद बदल सकता है।
आम कर्ज़दार के साथ क्या होता है
अब वह तुलना, जो हर पाठक के मन में आती है।
एक व्यक्ति गृह ऋण की कुछ किस्तें चूक जाए तो उसे बैंक से नोटिस मिलता है, उसका क्रेडिट स्कोर गिरता है, और सरफ़ाएसी अधिनियम के तहत उसके मकान की कुर्की और नीलामी की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। छोटे कारोबारी के लिए भी नियम यही हैं।
दूसरी ओर, इसी क़ानूनी ढाँचे में एक ऐसा रास्ता भी है जिसमें ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों पर ₹6.5 करोड़ की योजना मंज़ूर हो सकती है — क्योंकि बहुमत लेनदारों ने उसे मत दिया।
दोनों बातें एक ही क़ानून के भीतर हैं। यही इस ख़बर का असली सवाल है।
चार सवाल जो सार्वजनिक हित में हैं
एक। जब आपत्ति करने वाले लेनदारों ने शुद्ध-संपत्ति प्रमाणपत्रों में इतना बड़ा अंतर न्यायाधिकरण के सामने रखा, तो क्या योजना मंज़ूर करने से पहले फोरेंसिक ऑडिट और संपत्ति-अन्वेषण होना चाहिए था? यह नीति का प्रश्न है, किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं।
दो। आईबीसी में 75 प्रतिशत मत की सीमा है। क्या व्यक्तिगत जमानत के मामलों में केवल मत-प्रतिशत पर्याप्त कसौटी है, या वसूली का न्यूनतम अनुपात भी देखा जाना चाहिए?
तीन। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस जैसी संस्थाओं का पैसा अंततः जमाकर्ताओं और पॉलिसीधारकों का है। इस श्रेणी की कटौती पर संसद या नियामक के समक्ष अलग से रिपोर्ट क्यों नहीं रखी जाती?
चार। धारा 79(2)(g) की “सहयोगी” की परिभाषा इतनी संकीर्ण है कि निकटता के आरोप मात्र से मत अलग नहीं किए जा सकते। क्या यह परिभाषा व्यक्तिगत दिवाला के मामलों के लिए पर्याप्त है, या इस पर पुनर्विचार की ज़रूरत है?
ये सवाल हैं, निष्कर्ष नहीं।
एक क़ानूनी अंतर, जो अक्सर मिटा दिया जाता है
सार्वजनिक बहस में “बट्टे खाते में डालना”, “ऋण-माफी” और “समाधान योजना” — तीनों को एक कर दिया जाता है। ये एक नहीं हैं।
ऋण-माफी में ऋणदाता स्वेच्छा से देनदारी समाप्त करता है। बट्टे खाते में डालना बैंक की लेखा-प्रक्रिया है, जिसके बाद भी वसूली का अधिकार बना रह सकता है। दिवाला समाधान एक न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें लेनदार मत देते हैं और न्यायाधिकरण मंज़ूरी देता है; मंज़ूरी के बाद शेष दावे क़ानूनन समाप्त हो जाते हैं।
इस मामले में जो हुआ वह तीसरी श्रेणी है — दिवाला समाधान, ऋण-माफी नहीं। यह अंतर बताना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ग़लत शब्द से ग़लत निष्कर्ष निकलता है, और किसी पर अनुचित आरोप भी लग सकता है।
दस्तावेज़ चाहिए, नारे नहीं
इस ख़बर पर प्रतिक्रिया में नारे आसान हैं। स्टार24 न्यूज़ का आग्रह अलग है।
सार्वजनिक हित इसमें है कि —
- एनसीएलटी का पूरा आदेश सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाए;
- समाधान पेशेवर की दावा-सत्यापन रिपोर्ट सामने आए, ख़ासकर उन दावों पर जो बिना दस्तावेज़ स्वीकार हुए;
- मत-विभाजन का ब्योरा — किस लेनदार ने कितनी हिस्सेदारी के साथ क्या मत दिया — उपलब्ध हो;
- और यह स्पष्ट हो कि आपत्ति करने वाले बैंक अपील में जाएँगे या नहीं।
आँकड़े अपना वज़न ख़ुद रखते हैं। उन पर विशेषण चढ़ाने की ज़रूरत नहीं।
दूसरा पक्ष
इस आदेश पर सुभाष चंद्र की ओर से कोई सार्वजनिक बयान अभी उपलब्ध नहीं है। बार एंड बेंच के अनुसार न्यायाधिकरण में उनका पक्ष अधिवक्ता जी.पी. मदान, आदित्य मदान और राहुल नरूला ने रखा। समाधान पेशेवर की ओर से अधिवक्ता सजीव देवड़ा उपस्थित हुए। केनरा बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रितिन राय पेश हुए।
बार एंड बेंच के अनुसार, बहुमत की राय को औपचारिक रूप देने के लिए मामला अब मूल पीठ के समक्ष रखा जाएगा।
स्टार24 न्यूज़ ने इस रिपोर्ट के लिए स्वतंत्र रूप से कोई दावा सत्यापित नहीं किया है; उपरोक्त सभी तथ्य नीचे दिए गए प्रकाशित स्रोतों और न्यायाधिकरण की कार्यवाही की रिपोर्टिंग पर आधारित हैं।
स्रोत
- Bar and Bench, 27 अगस्त 2026 — “NCLT ruling reduces Subhash Chandra’s liability from over ₹22K crore to ₹6.25 crore in insolvency case” (एस.एन. त्यागराजन)। इससे: स्वीकृत दावे ₹22,006.57 करोड़; ₹6.25 करोड़ + ₹25 लाख; धारा 114; तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा; भारद्वाज–पुरी मतभेद; धारा 419(5); विवेक इंफ्राकॉन ₹170 करोड़; धारा 95; एलआईसी हाउसिंग ₹1,322.39 करोड़ बनाम ₹38.09 लाख; शुद्ध-संपत्ति प्रमाणपत्र; धारा 79(2)(g); धारा 115; अनिल कुमार व सुनील जैन के दावे; अधिवक्ताओं के नाम। आदेश की प्रति उस रिपोर्ट के साथ संलग्न है।
- Business Standard, 27 अगस्त 2026 — “NCLT clears Subhash Chandra’s ₹6.5 cr payout against ₹22,006 cr claims”। इससे: 80.81 प्रतिशत मत-हिस्सेदारी; विरोध करने वालों की 20 प्रतिशत से कम हिस्सेदारी; आपत्ति करने वाले बैंकों के नाम।
- Free Press Journal, 27 अगस्त 2026 — “NCLT Approves Subhash Chandra Repayment Plan; Creditors Face 99.97% Haircut On ₹22,006 Crore Claims”। इससे: कटौती का प्रतिशत।
- दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 — धारा 79(2)(g), 95, 114, 115। कंपनी अधिनियम, 2013 — धारा 419(5)।



